GDP क्या है? इसका Full Form क्या होता है!

GDP Full Form In Hindi – आप सभी देश की आर्थिक स्थिति के बारे में तो जानते ही हैं। अब बात आती है देश में किस तरह के उत्पाद शामिल हैं इन पर कितना टेक्स लगता है एवं इन उत्पादों का आयात और निर्यात कैसे किया जाता है। यहाँ हम बात करने जा रहे हैं GDP के बारे में GDP का मतलब “सकल घरेलु उत्पाद” है। बहुत से लोगों के मन में GDP के बारे में कई प्रकार के सवाल होंगे जैसे GDP क्या है? ये कहाँ से आया? इसका उपयोग क्या है इत्यादि। तो आज हम GDP के बारे बहुत कुछ जानेंगे।

GDP क्या है इसका Full Form क्या होता है?

what is the full form of gdp in hindi

GDP का Full Form “Gross Domestic Product” होता है जिसका मतलब है “सकल घरेलु उत्पाद” 1935-44 में अमेरिका के एक अर्थशास्त्री साइमन के द्वारा इसे पेश किया गया था। एवं साइमन ने GDP शब्द का परिचय दुनिया से कराया था। उस समय विश्व की बैंकिंग संस्थाओं का काम था आर्थिक विकास का अनुमान लगाना। उस समय इसके लिए कोई शब्द नहीं मिल पा रहा था लेकिन जब साइमन ने राजनीतिक पार्टी के सामने GDP शब्द को रखा और इसका मतलब समझाया तभी से आईएमएफ यानी अंतरराष्ट्री मुद्रा कोष ने इसे उपयोग किया और आज तक इसे उपयोग किया जा रहा हैं। ने

Gross Domestic Product (GDP) का उपयोग किसी भी देश की आर्थिक स्थिति को मापने के लिए किया जाता है। यह देश की आर्थिक स्थिति मापने का एक पैमाना है। हर तीन महीनों में देश की आर्थिक स्थिति को मापा जाता है। GDP का सम्पूर्ण आंकड़ा अर्थव्यवस्था के मुख्य उत्पादन क्षेत्रों में जो जो भी उत्पादन हैं उनकी वृद्धि दर पर निर्भर करता है। GDP के अंतर्गत कृषि, उद्योग व सेवा से तीनों चीज़ें आती हैं। इन क्षेत्रों में जब उत्पादन बढ़ता है और घटता है इसके ही आधार पर जीडीपी दर तय की जाती है।

GDP प्रस्तुत करने के तरीके

GDP का Full Form तो आपको पता चल ही गया चलिए अब इसके प्रस्तुत करने के तरीके को समझते है उत्पादन की कीमतें मंहगाई के साथ कम ज्यादा होने के कारण GDP को दो तरह से प्रस्तुत किया गया है। एक होता है कॉन्‍टैंट प्राइस और दूसरा है करेंट प्राइस। तो आखिर क्या हैं कॉन्‍टैंट प्राइस और करेंट प्राइस।

कॉन्‍टैंट प्राइस

सांख्यिकी विभाग उत्‍पादन व सेवाओं के सम्पूर्ण मूल्याङ्कन के लिए एक बेस इयर या आधार वर्ष तय किया गया है। इस वर्ष के दौरान जो भी कीमतें हैं उन्हें आधार बनाया जाता है और उसके अनुसार ही उत्‍पादन की कीमत और तुलनात्‍मक वृद्धि दर तय होती है। यह GDP को सही प्रकार से मापने की एक  प्रक्रिया है।

वर्तमान प्राइस (करेंट प्राइस)

जीडीपी के उत्‍पादन मूल्‍य में महंगाई की दर को जोड़ने पर आर्थिक उत्‍पादन की मौजूदा कीमत प्राप्त हो जाती है। इसका मतलब है कि आपको कॉस्‍टैंट प्राइस जीडीपी को तात्‍कालिक महंगाई की दर से जोड़ना होगा।

बेस ईयर या आधार वर्ष

मान लीजिये वर्ष 2011 के अंतर्गत देश में 100 रुपये की सिर्फ तीन वस्तुएं बनीं तो कुल GDP होगी 300 रुपये। अब वर्ष 2017 तक इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया पर कीमत यहाँ हुई 150 रुपये और नॉमिनल जीडीपी 300 रुपये हुई। लेकिन यहाँ तरक्की हुई या नहीं सवाल ये है। तो यहीं पर बेस ईयर या आधार वर्ष का फॉर्मूला कार्य करता है। 2011 की कॉस्टेंट प्राइस के अनुसार वास्तविक जीडीपी 200 रुपये हुई। और ये साफ़ हो गया कि यहाँ GDP में गिरावट हुई।

यहाँ दो चीज़ें आती है GDP और GVA और इन दोनों को ही समझना बहुत जरुरी है। तो अब जानेंगे GVA के बारे में। GVA क्या है और GVA का क्या उपयोग है। GVA क्या है? यह जानना बहुत जरुरी है। वैसे तो ये दोनों ही अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए अहम् पैरामीटर हैं।

GVA क्या है?

एक तय अवधि के अंतर्गत इनपुट कॉस्ट और कच्चे माल का मूल्य निकालने के बाद कुल कितने रुपये की वस्तुओं और सेवाओं का पूरा उत्पादन हुआ यह जानने के लिए GVA का इतेमाल किया जाता है। इसका पूरा नाम ग्रॉस वैल्यू ऐडेड है। सप्लाई साइड से होने वाली आर्थिक गतिविधियों का पता लगाने के लिए GVA का इस्तेमाल किया जाता है। और जीडीपी में डिमांड या कंज्यूमर साइड होता है। ये जरुरी नहीं है कि दोनों ही आंकड़े समान हों क्योंकि दोनों में नेट टैक्स के ट्रीटमेंट का अंतर होता है।

GDP एवं GVA में क्या अंतर

GDP उपभोगता के नजरिए से आर्थिक उत्पादन को दर्शाता है जिसके अंतर्गत सरकारी निवेश, निजी खपत, सरकारी खर्च, अर्थव्यवस्था में सकल निवेश एवं नेट फॉरेन ट्रेड इन सभी में फर्क शामिल होता है। वही GVA में जो निर्माता हैं मतलब जो सप्लाई कर रहे हैं उनकी तरफ से होने वाली आर्थिक गतिविधियों के बारे में बताता है।

GVA को महत्व क्यों दिया गया

GVA से जो क्षेत्रवार विकास मिलता है उससे निति निर्माताओं को फैसला लेने में काफी सरलता होती है कि किस क्षेत्र में इंसेंटिव वाले राहत पैकेज की आवश्यकता है। ऐसा भी माना जाता है कि GVA अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में जानने का सबसे आसान तरीका है। ज्यादा टैक्स कलेक्शन होना ही उत्पादन में तेज बढ़ोतरी को नहीं दर्शाता। क्योंकि बेहतर अनुपालन या ज्यादा कवरेज के कारण भी ऐसा होना संभव है।

अगर बात की जाये कि GVA और GDP में कौन सा पैमाना सही है तो GVA में हर क्षेत्र में उत्पादन आकड़ों को अलग तरह से दर्शाता है और किस क्षेत्र में इंसेंटिव की जरूरत है यह पता करने में आसानी होती है। लेकिन GDP द्वारा बताया गया आंकड़ा उस समय महत्वपूर्ण है जब अपने देश की अर्थव्यवस्था की तुलना किसी अन्य देश की अर्थव्यवस्था से करना है। साथ ही GDP में दोनों देशों की आय की तुलना की जाती है।

GDP कम होने के परिणाम

मान लीजिये किसी वर्ष में प्रति व्यक्ति मासिक आय 10,534 रुपये के अनुसार और वार्षिक जीडीपी 5% होने का मतलब है कि प्रति व्यक्ति आय उस वित्त वर्ष 526 रुपये बढ़ेगी। दूसरे शब्दों में अगर GDP में 4 फीसदी की दर से वृद्धि होती है तो आमदनी में 421 रुपये की बढ़त होगी। मतलब कि 1 फीसदी की कमी से प्रति व्यक्ति की औसत मासिक आमदनी में 105 रुपये की कमी आएगी। वहीं अगर वार्षिक GDP दर 5 से गिरकर 4 फीसदी हो गई है तो प्रति माह आमदनी में 105 रुपये की कमी होगी इसका मतलब है कि एक व्यक्ति को वर्ष में 1260 रुपये कम मिलेंगे।

GDP का आधार

भारत की GDP या GDP की बात करें तो GDP तय करने के मुख्य आधार होते हैं। भारत की GDP देश के एग्रीकल्चर, इंडस्ट्री और सर्विसेज़ के आधार पर निर्भर करती है और इनके आधार पर ही तय की जाती है। इन तीनों घटकों के उत्पादन बढ़ने या घटने के आधार पर ही देश की GDP तय की जाती है। देश का आर्थिक विकास भी इससे मापा जाता है। अन्य शब्दों में अगर देश की GDP का आंकड़ा बढ़ता है तो आर्थिक विकास दर भी बढ़ती है और अगर ये पिछले तीन महीनों के मुकाबले कम है तो देश की आर्थिक स्थिति में भी गिरावट आएगी।

भारत में GDP आंकड़े तय करने वाली संस्था

यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है क्योंकि इस मापदंड पर पूरे देश का आर्थिक विकास तय किया जाता है। तो सरकारी संस्था CSO मतलब केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा GDP के आंकड़े तय किये जाते हैं। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय पूरे देश के उत्पादन और सेवाओं का सम्पूर्ण आंकड़ा जुटाता है और इसके आधार पर GDP तय की जाती है। इसमें कई सूचकांक होते हैं जैसे औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) एवं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई)।

GDP को समझने के लिए इनका ध्यान रखना है जरुरी

GDP को समझने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत ही ज्यादा जरुरी है।

मान लीजिये वर्ष 2011 में देश में 100 रुपये की कुल तीन वस्तुएं बनीं तब GDP हुई 300 रुपये और 2017 तक इस वस्तु का उत्पादन मान लीजिये सिर्फ 2 ही रह गया लेकिन यहाँ कीमत हो गयी 150 रुपये। अब इस स्थिति में नॉमिनल GDP हो जाएगी 300 रूपये।

अब पहले वाली स्थिति में आधार वर्ष का फार्मूला बहुत उपयोगी होता है। 2011 की कॉस्टेंट कीमत जो 100 रूपये थी के अनुसार वास्तविक जीडीपी 200 रुपये हुई। अब यहाँ बिलकुल साफ़ रूप में GDP में आई गिरावट को देखा जा सकता है।

सीएसओ के द्वारा मुख्य रूप से आठ औद्योगिक क्षेत्रों के आंकड़े देखे जाते हैं खनन, कृषि, बिजली, मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं। और इन आंकड़ों के अनुसार डब्ल्यूपीआई और सीपीआई का प्रयोग करके GDP निकली जाती है।

नॉमिनल GDP और रियल GDP में अंतर

नॉमिनल GDP और रियल GDP में अंतर जानना बहुत ही जरुरी है। GDP की गणना दो प्रकार से की जाती है। नॉमिनल GDP और रियल GDP । तो इनके बारे में पता होना आवश्यक है।

नॉमिनल GDP

जब एक वर्ष के अंतर्गत उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों की गणना बाजार मूल्यों या कर्रेंट प्राइस के आधार पर की जाती है तो GDP का मूल्य प्राप्त होता है उसे ही नॉमिनल GDP कहा जाता है। इसमें मुद्रास्फीति की वैल्यू भी जुडी होती है।

रियल GDP

रियल GDP से अर्थ है एक साल में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों की गणना आधार वर्ष के मुख्य या फिर स्थिर प्राइस पर की जाये। तो इससे GDP का मूल्य प्राप्त हो जायेगा।

क्रय शक्ति समता के आधार पर अगर देखा जाये तो भारत, दुनिया भर की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। स्थिर प्राइस के आधार पर भारत दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वहीं इसका आकार लगभग 2.9 ट्रिलियन डॉलर के बराबर है।

GDP का इतिहास

वर्ष 1654 और 1676 के बीच डच और अंग्रेजों के मध्य अनुचित टैक्स को लेकर जोरदार बहस हुई। और इस ही दौरान विलियम पेट्टी ने जमीदारों की आलोचना करते हुए GDP जैसी अवधारणा को सबके सामने पेश किया। लेकिन GDP की विस्तृत और आधुनिक अवधारणा सबसे पहले वर्ष 1934 में अमेरिका में सिमोन कुनजेट ने दी। जिसे स्वीकारा गया लेकिन सिमोन कुनजेट ने बताया कि इसे कल्याणकारी कार्यों के मापन के रूप में प्रयोग नहीं की जा सकता। वर्ष 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के बाद देशों की अर्थव्यवस्था के मापन के लिए GDP का इस्तेमाल किया जाने लगा।

GDP के अन्तर्गत पहले देश में रहने वाले और देश से बाहर रहने वाले नागरिकों की आय को जोड़ा जाता था। अब इसे ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट के नाम से जाना जाता है।

GDP का आम लोगों से सम्बन्ध

GDP देश के आर्थिक विकास और स्थिति से सीधे सम्बंधित है वैसे ही GDP का असर आम लोगों पर भी पड़ता है। जैसे अगर GDP के अंखडें अच्छे नहीं होते तो यह देश की आर्थिक तंगी को दर्शाते हैं। और अगर GDP कम होती है तो लोगों की औसत आय में कमी आती है साथ ही लोग गरीबी रेखा के नीचे आने लगते हैं। इतना ही नहीं नौकरियाँ भी कम उपलब्ध होती हैं साथ ही कम्पनियाँ अपने वर्कर को निकालने लगती है। और इसी के साथ लोगों की बचत और निवेश कम हो जाता है।

जीडीपी पर भरोसे को लेकर आलोचनाएँ

GDP पर भरोसे को लेकर यह आलोचना है कि इसे जीवन स्तर का पैमाना नहीं मान सकते। लेकिन इसमें अच्छी बात ये है कि हर तीन महीने में या समय-समय पर जारी किया जाता है। इसमें कई चीज़ें शामिल नहीं होती हैं जैसे देश से बाहर होने वाले नागरिकों या कंपनियों की आय। साथ ही इसमें बाजार से बाहर हो रहे लेन देन को नहीं मापा जा सकता। उदहारण के लिए राम ने 10 किलो अनाज को देकर रमेश से 10 किलो अमरूद खरीद लिए। इस प्रकार का लेनदेन कभी भी GDP का हिस्सा नहीं बनता।

जिन देशों बाजार में लेन देन और कैश का आंकड़ा कम होता है उस देश की GDP हमेशा कम होती है। वर्ष 1934 में सिमोन कुजनेट्स ने अमेरिका कांग्रेस में अपनी पहली रिपोर्ट प्रेषित करते हुए कहा था कि तक व्यक्तिगत आय के वितरण की जानकारी नहीं मिलती तब तक इसका सही मापन नहीं हो पायेगा। और यह पता नहीं चल सकता कि लोगों का आर्थ‍िक कल्याण हुआ या नहीं।

GDP देश की अर्थव्यवस्था के मापन का एक बहुत ही उम्दा जरिया है जिससे देश का आर्थिक विकास हुआ है या नहीं या हो रहा है या नहीं यह देखना और जान पाना संभव है। तो GDP को लेकर कई तरह की आलोचनाएं भी हैं लेकिन इसके फायदों को भी नहीं नकारा जा सकता।

Tips

तो दोस्तों अब आप भी GDP का Full Form जान गए होंगे एवं इसका उपयोग कैसे किया जाता है इसके फायदे और नुकसान भी आपको पता चल गया होगा अगर आपको GDP Full Form in Hindi के ऊपर दी गई ये जानकारी पसंद आई है तो इसे अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर अवश्य शेयर करे ताकि उनको भी इसके बारे मे सही जानकारी प्राप्त हो सके।

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